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द डायरी ऑफ अ यंग गर्ल

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Hello world

द डायरी ऑफ अ यंग गर्ल
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विपरीत परिस्थितियों में साहस और चेतना की प्रतीक हैं एनी फ्रैंक
""मैं बेकार नहीं जीना चाहती, जैसे ज्यादातर लोग जीते हैं। मैं उन लोगों को जानना चाहती हूँ जो मेरे आसपास रहते हैं लेकिन मुझे नहीं जानते। मैं उनके काम आना और उनके जीवन में ख़ुशी लाना चाहती हूँ। मैं और जीना चाहती हूँ, अपनी मौत के बाद भी""
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ये उस एनी फ्रैंक के डायरी का हिस्सा है, जिसे दुनिया उसकी डायरी के वजह से जानती है। एनी फ्रेंक एक यहूदी थीं और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने परिवार के साथ छिपकर रहती थीं। जब वे 13 वर्ष की थी तो उनके पिता ने उनके जन्मदिन पर उन्हें एक डायरी गिफ्ट की थी। उस डायरी में एनी अपने रूटीन के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए नाजियों के अत्याचार का भी वर्णन किया है।
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जब पूरी दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध को झेल रहा था तब नीदरलैंड पर नाजियों ने कब्जा कर लिया था। लोगों को छिपकर रहना पड़ता था और उन्हीं लोगों में से एक था एनी फ्रैंक का परिवार। एनी फ्रैंक का जन्म जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में 12 जून 1929 को हुआ था। वे बचपन से ही एक लेखिका और जर्नलिस्ट बनना चाहती थी। जब वो चार साल की थी तभी जर्मनी पर नाजियों का नियंत्रण हो गया। यहूदियों के साथ जर्मनी में हो रहे भेदभाव के कारण एनी का परिवार उनके जन्म के कुछ दिन बाद ही फ्रैंकफर्ट छोड़कर नीदरलैंड आ गया। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के दौरान एनी 10 साल की थी। उन्होंने अपना आधा बचपन परिवार के साथ छिपकर बिताया।
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एनी ने सीक्रेट जगह पर आने के पहले ही डायरी लिखने की शुरुआत कर दी थी और अपनी डायरी का नाम किट्टी रखा, उसे वे अपना बेस्ट फ्रेंड मानती थीं। उन्होंने गोलियों की आवाज, लोगों की चीखें और हर वह चीज डायरी में लिखी जिसे एनी ने बेहद करीब से देखा था। वे दुनिया को और बातें बताना चाहती थीं लेकिन 1944 में उन्हें और उनके साथ के लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया और डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया।
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एनी की मृत्यु 15 साल की उम्र में बैर्गेन बेलसेन के यातना शिविर में टायफस फीवर, भूख, कमजोरी और यातना के कारण हो गई। एनी अपने जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहती थीं। विश्व युद्ध समाप्त होने पर एनी के पिता ओटो फ्रैंक, जो परिवार के अकेले जीवित व्यक्ति थे, यातना शिविर से वापस आने के बाद अपनी बेटी की लिखी हुई डायरी को छपवाया और उनके लेखक बनने के सपने को साकार किया।
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बहुत छोटी सी उम्र में एनी अपनी साहस और चेतना के लिए दुनिया के लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई। कहा जाता है कि एनी फ्रैंक की यह डायरी बाइबिल के बाद दूसरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। 1947 में 'द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल' नाम से यह डायरी पहली बार छपी और अब तक 70 से अधिक भाषाओं में छप चुकी है।
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