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आज भी युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित करते है चार्ल्स डार्विन

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आज भी युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित करते है चार्ल्स डार्विन
चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) वह वैज्ञानिक थे जिनके विकासवाद के सिद्धांत ने जीवविज्ञान और उससे संबंधित विषयों में क्रांतिकारी बदलाव लाकर पूरे विज्ञान विश्व में हलचल मचा दी थी। उनकी 25 सालों की मेहनत ने वैज्ञानिकों की सोच को बदल दिया था और जीव वैज्ञानिकों को एक दिशा प्रदान की थी। उन्हें मानव इतिहास का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। उनका अधिकांश योगदान उनके विकासवाद की किताब 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशिस' (On the Origin of The species) के जरिए रहा। आइए जानते है कि डार्विन ने किस तरह से वैज्ञानिक जगत के साथ-साथ दुनिया और समाज को प्रभावित किया।
चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। डार्विन को परंपरागत पढ़ाई में कभी दिलचस्पी नहीं रही। वे अपने डॉक्टर पिता के सहायक रहे और उन्होंने भूगर्भ विज्ञान भी पढ़ा। प्रकृति विज्ञान में उनकी रुचि धीरे-धीरे विकसित हुई जो बहुत गहरी होती चली गई। डार्विन ने 1831 को अपनी समुद्री यात्रा शुरू की। उनका कहना है कि यह यात्रा उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय साबित हुआ था। पांच साल की इस यात्रा में डार्विन ने चार महाद्वीपों की यात्रा की और पक्षियों और पौधों के बहुत से जीवाश्म जमाकर उनका अध्ययन किया।
लेकिन इस यात्रा के बाद डार्विन को पता था उनका अध्ययन काफी नहीं हैं वे इसे गहराई तक ले जाकर इसे व्यवस्थित रूप देना चाहते थे। पहले डार्विन ने अपनी नोटबुक से काम चलाया फिर से भी व्यवस्थित किया और शोधपत्र प्रकाशित करना शुरू कर दिए। समय के साथ डार्विन के काम का समय बढ़ता गया जिसका असर उनकी सेहत पर हुआ।
डार्विन का शोधकार्य और अध्ययन को व्यवस्थित करने का काम सालों तक चलता रहा उन्होंने अपने विचार और पड़ताल के नतीजे 'द ओरिजन ऑफ स्पीसीज' में प्रकाशित किए जिसमें उन्हें 20 साल का समय लग गया। क्योंकि वे आशंकित थे कि इस पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी। डार्विन की किताब को बढ़िया रिस्पॉन्स मिला। साथ ही कई आलोचक भी पैदा हुए। वहीं चर्च की मिली जुली प्रतिक्रिया थी क्योंकि डार्विन ने सीधे तौर पर ईश्वर को चुनौती ही नहीं दी थी। कुछ लोगों ने प्राकृतिक चयन को ईश्वर का हथियार तक करार दिया। लेकिन डार्विन ने एक तरह से सभी को प्रभावित किया।
डार्विन का सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने धर्म और विज्ञान की भूमिकाओं पर लोगों को फिर से विचार करने पर मजबूर किया। उनकी खोजों और सिद्धांतों ने बहुत सारी बातों को धर्म के दायरे से निकाल कर विज्ञान में ला दिया। इसमें प्रकृति का विज्ञान के करीब आ जाना सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
हैरानी की बात है कि जब डार्विन 1882 तक दुनिया में थे तब तक अनुवांशिकी, जीन, डीएनए जैसे शब्दों की उत्पत्ति ही हुई थी। डार्विन को खारिज करने के कुछ प्रयास भी हुए, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। डार्विन के सिद्धांत आधारभूत सिद्धांत हो गए हैं। आज भी उनकी खोज के तरीके युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित करते हैं।
 


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